भगवान शब्द - सुरजानाथ।

सत सनातन, नकली सनातन, आस्तिक, नास्तिक, भगवान व मोमिन का सच :
सारे वेदों में, केवल ऋग्वेद में एक बार "भगवान" शब्द आया है (10/60/12), वह भी भाग्यशाली (lucky) इस अर्थ में; तृष्णा के जलने (भग्ग+वान) के अर्थ में नहीं। व आखिरी अथर्ववेद (भाष्य) में एक बार सनातन शब्द आया है। सो प्रोपागंडा के पिछे के सत-असत को जाने। वर्णाश्रम, उच-निचता, पाप-पुण्य योनी आदि बुद्धिभ्रम करनेवाली, मांत्रिक-तांत्रिक कर्मकांडी, लोक-परलोक आस विचार की पैदाइश, कालांध वैदिक धंधा परंपरा, जिसमें मानवीय गरिमा की अवमानना है, कब व कैसे सनातन हो गयी? और अब हिंदू?

भग्ग रागो भग्ग दोसो भग्ग मोहो अनासवो।
भग्गस्स पापका धम्मा भगवा तेन उच्चति।।
— भगवान बुद्ध।
भग्ग (भग्न) + वान (तृष्णा) से भगवा भगवान इति।

सनातन = कुदरतन, अपने आप से, विचार की पैदाइश नहीं, eternal, laws of nature by itself, सार्वजनीन, सार्वभौम। सनातन की बात बुद्ध बारिकि से अनेकों बार करते है।
उदाहरण के लिए —
न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीधा कुदचनम्।
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनंतनो।
— बुद्ध।

सनातन, भगवान शब्दों बाबत जाने कि, ये बुद्ध ने गढे व व्याख्यायित कर इस्तेमाल किये हैं। वेदों को इनका पता नहीं। अलख, निरंजन, अवधू यह शब्द भी वेदों में नहीं है। 

अस्ति (आसति), अस्तिता, अस्तित्व, आस्तिक, आस्तिकता यह सब एक ही मूल से है। आस्तिक = तथता से जीनेवाला; यथाभूत सत, भाव-पवनां या वेदनां-भावनां, actuality से जीने वाला। आस्तिकता = वास्तविकता से जीने की कला, अलख संग्यान सूं भाव-पवनां दरसण ध्यान की स्वस्थ बात है। सो अस्ति जीये वह आस्तिक वै, मन-मगज से स्वास्थ्य पूर्वक है। 
धरम के नाम पर इश्वरनाम कल्पनाएं, मतलब न + अस्ति > नास्ति > नास्तिक > नास्तिकता, यह ग्यात (known), काल का परदा, अंधता होती है । मतलब, पेड़ का प्रत्यक्ष देखा जाना यह वास्तविक सत है; और पेड़ की याददाश्त या विचार यह काल्पनिक सत है, जिसकी दुनियादारी में अपनी जगह है। विचार में डिजाइन करने की क्षमता है; पर ऐसे ना हो कि विचार इश्वर या धरम पथ डिजाइन करने लगे। 
"आसति छै हो पिंडता नासति नांहीं. . ."
(आसति है हो पंडिता नासति नांही।) 
"O pandits, What is is the way, not not is. . ."  — गोरख, सबदी 201.

विडंबना है कि, आत्मा-परमात्मा की संकल्पनाओं को साइड करने वाले भ. बुद्ध को यहां महात्मा कहने की कुटिलता होती हैं, अर विष्णु शंकर राम कृष्णादि मनमुखी देवताओं को भगवान कहते हैं। 
अलख (संग्यान) = अ- (no, not, un-, without) + लख (लखना, to see, सो लख, लखित, लखा हुआ) देखा हुआ, मतलब, ग्यात। ग्यात/विचार की जगह व मर्यादा को समझकर ग्यात से मुक्तता, (भले मन में विचार शृंखला चलती हो या नहीं), सो अजानता से रहना, व यथाभूत सत भाव-पवनां दर्शन यह चैतसिक शुन्यता होती है। अलख संग्यान यह ध्यान-ग्यान समाई सादी सरल बात है।

आसति (अस्ति) जीये वह अत्ता ही अत्तनो नाथ होता/ती है, आस्तिक होत है। वैदिक जैसे ही नित्य, अमर आत्मा आदि ग्यात लेकर चलने वाले जैन तिर्थंकर कैसे नाथ व सिद्ध है? समझ स्त्री वा पुरुष नहीं होती, हिजड़ा भी नहीं होती; समझ का लिंग, वर्ण, जाति नहीं होती; समझ खुले जेहन में सहज खुलती है; सो साधू अर सज्जन की कोई जात, वर्ण, धरमनाम परंपरा नहीं हो सकती।

अस्ति जीये वह आस्तिक : अलख संग्यान सूं सिद्ध-बुद्ध सनातन धरम धारा।
वैदिक-पुरानादि नास्तिक : ग्यात संग्यान सूं किताबी कालांध धर्मांध परंपरा।।

अस्ति संग्यानी मीम व मोमिन अरबी मूल से है, बोधि धरम से जीने की कला है। मगर जैसे अस्ति जीये सम्यक आस्तिक बुद्ध को झूठमूठ नास्तिक, महात्मा प्रचारित करते है, सो कुरानी धर्मांध को अब उल्टे मोमिन कहा जाता है — विडंबना है। 

— Yogi Surajnath.
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