शिव, त्रिशूल।


बॊधिसत्व की मूर्ति और त्रिशूल (त्रिरत्न का प्रतीक) का रहस्य! :
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अब आप ही बताइए; कि कौन किसकी नकल कर रहा है? बोधिसत्त्व की प्रतिमा के हाथ में त्रिरत्न का प्रतीक त्रिफलक को दर्शाया गया है; जिसे बाद में त्रिशूल बनाकर शिव के हाथ में दे दिया गया?  

बोधिसत्त्व के हाथ में आप जो तीन फलक देख रहे हैं, यह त्रिशूल नहीं है; बल्कि "बुद्ध, धम्म और संघ" नामक तीन बुद्ध 'धम्म' के प्रतीक हैं। ये स्तूपों, विहारों, चैत्य आदि पर दिखाई पड़ते हैं। अब आप ही बताईये! तीसरी शताब्दी में बने इन धम्म प्रतीकों को कैसे और कब चुराया गया?

'सिव' नामक शब्द बुद्ध के लिए प्रयोग में आया, जिसका अर्थ 'कल्याणकारी' है। विश्व में तथागत ही 'कल्याणकारी' के रूप में जाने जाते हैं, जबकि कालांतर में भारत से बुद्ध धम्म लुप्त होने के बाद शिव की उत्पत्ति हुई और शैव और वैष्णव सम्प्रदाय बनें, हिन्दू धर्म कहीं भी दिखाई नही दिया? जिसे आज शंकर, भोला, नीलकंठ, महादेव आदि कहा जाता है। देखा जाए तो भारत में बुद्ध को ही महादेव यानि देने वाले सबसे बड़े देव महादेव के रूप में जाना जाता है। क्योंकि बुद्ध कल्याणकारी हैं। 

आप देखेंगे शंकर की आकृति बुद्ध की प्रतिमाओं की तरह ध्यान में दिखाई जाती है? जबकि उनका पसंदीदा खाद्य धतूरा आदि नशीले पदार्थ हैं, फिर नशे की हालत में कोई कैसे सीधा बैठ सकता है?

इस तरह बुद्ध धम्म से बहुत सी चीजें चुरा ली गईं हैं, क्योंकि भारत से बौद्ध धम्म खत्म हो चुका था, तो फिर मूर्ति हों, सिद्धान्त हों, चैत्य हों उन्हें थोड़ा सा तब्दील करके अपना बना लिया गया। क्योंकि भारत में इन कृत्यों का विरोध करने वाला कोई था ही नहीं।

आपको मैं, जो बात समझाना चाह रहा था आशा है, कि उसे आप समझ ही गए होंगे। तीन फलक वाला यह कथित त्रिशूल और कुछ नहीं; बल्कि बुद्ध धम्म के त्रिरत्न (बुद्ध, धम्म और संघ) का प्रतीक है।



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भले ही आज शिव और त्रिशूल एक - दूसरे के पर्याय हो गए हों, लेकिन त्रिशूल की पहली शिल्पकारी बौद्ध कला में मिलती है।

कला क्षेत्र में हारिति पहले त्रिशूलधारी हैं, शिव के साथ त्रिशूल बहुत बाद में जुड़ा है।

ये त्रिशूलधारी हारिति की मूर्ति पेशावर से मिली है और कुषाण काल की है, शिव की इतनी प्राचीन कोई भी त्रिशूलधारी मूर्ति नहीं मिलती है।

त्रिशूल का विकास त्रिरत्न से हुआ है, साँची स्तूप का त्रिरत्न की आकृति त्रिशूल से तुलनीय है।

जो कहा जाता है कि काशी त्रिशूल ( त्रिरत्न ) पर है, वह बौद्ध स्थल सारनाथ की लाक्षणिक अभिव्यक्ति है।

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