कस्सप बुद्ध।
कस्सप बुद्ध के गाँव की खोज
कस्सप बुद्ध ठीक गौतम बुद्ध से पहले के बुद्ध थे। कस्सप बुद्ध के गाँव में प्राप्त साक्ष्य के अनुसार सबसे पहले सम्राट अशोक गए थे। वहाँ उन्होंने उनकी स्मृति में दो स्तूप बनवाए थे। ये बात ह्वेनसांग ने बताई है।
फिर पाँचवी सदी में कस्सप बुद्ध के जन्म - स्थल पर फाहियान पहुँचे। उन्होंने कस्सप बुद्ध के गाँव का नाम " टू - वेई " बताया है।
फिर सातवीं सदी में कस्सप बुद्ध के गाँव ह्वेनसांग पहुँचे। उन्होंने उनका गाँव श्रावस्ती से 16 ली की दूरी पर उत्तर - पश्चिम में बताया है।
आधुनिक काल में कस्सप बुद्ध के गाँव की खोज में कनिंघम पहुँचे। उन्होंने 1863 एवं 1876 में दो बार उस गाँव की यात्रा की।
कनिंघम ने फाहियान द्वारा कस्सप बुद्ध के बताए गए गाँव " टू - वेई " की पहचान टंडवा गाँव के रूप में की। यह टंडवा गाँव श्रावस्ती से पश्चिम 14 किलोमीटर की दूरी पर है, जो काफी हद तक चीनी यात्रियों के बताए गए स्थान से मेल खाता है।
कनिंघम ने देखा कि टंडवा गाँव ईंट के खंडहरों के बीच बसा है। गाँव के उत्तर - पश्चिम में उन्होंने 800 फीट लंबा और 300 फीट चौड़ा ईंट के खंडहरों का टीला देखा। ह्वेनसांग ने नगर के उत्तर दिशा में कस्सप बुद्ध की शरीर धातुओं पर सम्राट अशोक द्वारा निर्मित स्तूप का आँखों देखा वर्णन किया है। कनिंघम को विश्वास हो गया कि वो यही स्तूप है, जिसे सम्राट अशोक ने कस्सप बुद्ध की शरीर धातुओं पर बनवाए थे।
स्तूप का व्यास 74 फीट था, जिसका रेखांकन कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में किया है ( चित्र - 2 )। तब वह स्तूप खेतों से 18 फीट ऊँचा था। कनिंघम स्तूप के बीचों - बीच खुदाई कराना चाहते थे। लेकिन वे इसकी खुदाई नहीं करा पाए। कारण कि विशाल स्तूप के ऊपर शिवलिंग और सीता माई का मंदिर स्थापित था।
फिर कनिंघम ने आसपास की सफाई करवाई। स्तूप का तोरण - द्वार और रेलिंग के अवशेष मिले। एक शिलालेख भी मिला, जिस पर " स्थाहनवा आराम " लिखा था। कनिंघम ने हनुमान गढ़ी टीले को दूसरे स्तूप के रूप में शिनाख्त की ( चित्र -3 )। फिर उन्होंने कस्सप बुद्ध के गाँव की रूपरेखा का रेखांकन तैयार किया ( चित्र - 1)।
इस प्रकार कनिंघम ने बड़ी मशक्कत से कस्सप बुद्ध के जन्म - स्थान की खोज की थी।
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कश्यप बुद्ध, ककुच्छंद बुद्ध और कनकमुनि बुद्ध के जन्मस्थान पर जाने का यात्रा - विवरण फाहियान ने अपनी पुस्तक के इक्कीसवें खंड में लिखा है।
आप भी पढ़िए, गौतम बुद्ध से पहले भी बुद्ध हुए हैं और यदि हुए हैं तो बौद्ध सभ्यता का पिछला छोर पीछे कहाँ तक जाएगा ?
अमूमन 28 बुद्ध माने जाते हैं। एक बुद्ध का कार्य - काल यदि 50 साल भी मानें तो 28 बुद्ध का 1400 साल हुए। अब गौतम बुद्ध के कार्य-काल से 1400 साल पीछे की ओर जाइए तो कहाँ पहुँचिएगा ? वही सिंधु घाटी सभ्यता में!
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28 बुद्धों में से सप्तबुद्ध ( The Seven Buddhas ) की स्तुति बौद्ध साहित्य में अधिक लोकप्रिय है। दीघनिकाय के महापदानसुत में सप्तबुद्ध का विस्तृत वर्णन है। सप्तबुद्ध में विपस्सी बुद्ध, सिखी बुद्ध, वेस्सभू बुद्ध, ककुसंध बुद्ध, कोणागमन बुद्ध, कस्सप बुद्ध और गोतम बुद्ध शामिल हैं।
सप्तबुद्ध की मंडली के पाँच नाम भरहुत स्तूप पर अंकित हैं। सिखी बुद्ध का नाम स्पष्ट नहीं है, जबकि वेस्सभू के नाम की जगह " भगवतो बोधि सालो " लिखा है। बाकी पाँच बुद्धों के नाम कोई दो हजार साल से भी पहले अंकित कराए गए हैं। बतौर नमूना भरहुत स्तूप पर अंकित कोणागमन बुद्ध और विपस्सी बुद्ध के अभिलेख क्रमशः तस्वीर एक और दो में दिए गए हैं। एक में लिखा है - भगवतो कोणागमनस्स बोधि और दूसरे में लिखा है - भगवतो विपस्सिनो बोधि। दोनों बुद्ध के नाम लाल घेरे में हैं।
सप्तबुद्ध का दूसरा प्रमाण हमें साँची स्तूप पर मिलता है। इसमें 3 स्तूप एवं 4 बोधिवृक्ष के माध्यम से सप्तबुद्ध को दर्शाया गया है। तीसरी तस्वीर साँची स्तूप पर अंकित सप्तबुद्ध की है।
सप्तबुद्ध का तीसरा सबूत हमें एलोरा की गुफा संख्या 12 में मिलता है। इसमें सप्तबुद्ध को पत्थरों पर उकेरा गया है। आप इसे चौथी तस्वीर में देख सकते हैं।
सप्तबुद्ध के अनेक पुरातात्त्विक प्रमाण हैं।कैलिफोर्निया के एक म्यूज़ियम में पाकिस्तान एवं भारत से प्राप्त सप्तबुद्ध की अलग - अलग दो मूर्तियाँ रखी हुई हैं। आप इन्हें तस्वीर पाँच और छः में देख सकते हैं।
कुल मिलाकर सप्तबुद्ध का वर्णन हमें न सिर्फ साहित्य में बल्कि हजारों साल पहले की कलाओं में भी अंकित मिलता है। ऐसा पुरातात्त्विक अंकन हमें संस्कृत साहित्य में वर्णित सप्तर्षि का नहीं मिलता है। ऐसे में माना जाना चाहिए कि संस्कृत साहित्य में सप्तर्षि की अवधारणा बौद्ध परंपरा के सप्तबुद्ध की देन है।
28 बुद्धों की परंपरा सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर गौतम बुद्ध तक फैली हुई है।!
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